लाभ
की व्यवस्था में
स्थान
की व्यवस्था में
या यूँ कहें
युगों युगों से चली आ रही
बनी बनायी व्यवस्था में
लाभ के लिये
स्थान खोजते आदमी
या इसमें अपना
स्थान बनाते आदमी
बहुत
सच, नहीं होते हैं
सच
पूछा जाये तो
न उनके पास
कहने के लिये कुछ होता है
न ही उनके पास
देने
के लिये कुछ होता है
फिर
भी वे
बहुत कुछ कहते हैं रोज
देते हैं रोज
कृपा दृष्टि / भीख
सीधे-सीधे
वे
अपना लाभ खोजते
या इसमें
अपनी
स्थिति बनाते
बहुत बहुऽऽत
दूर होते हैं
बहुत पास होते हैं
उनके लफ्ज मीठे बहुत मीठे
सच-सच
नहीं
पर
सुनहरे सपनों के साथ
वे
बहुत बहुत
पास
होते हैं हमारे ।
या यूँ कहें
युगों युगों से चली आ रही
बनी बनायी व्यवस्था में
लाभ के लिये
स्थान खोजते आदमी
या इसमें अपना
स्थान बनाते आदमी
न उनके पास
कहने के लिये कुछ होता है
न ही उनके पास
बहुत कुछ कहते हैं रोज
देते हैं रोज
कृपा दृष्टि / भीख
अपना लाभ खोजते
या इसमें
बहुत बहुऽऽत
दूर होते हैं
बहुत पास होते हैं
उनके लफ्ज मीठे बहुत मीठे
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लाभ की व्यवस्था