भूल-भुलैया

आदमी आदमी को 
सीढ़ी बनाता है,
चढ़ता है
दूसरों को धक्का देकर
 
आदमी सीढ़ी बनता है 
चढ़ाता है दूसरों को 
अपने को 
स्थापित करने के लिये
 
आदमी चढ़ता है सीढ़ी पर 
गिरता है चढ़ता है 
खत्म नहीं होती है सीढ़ी 
आता है एक समय 
बन जाती है सीढ़ी
भूल-भूलैया !

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