चिंतन में

जनता के
परम्परागत चिंतन में 
स्मृतियों में संस्कृतियों में 
परम्पराओं में अवधारणाओं में 
मूल्यों में 
साम्राज्यवादी सत्तायें 
फासीवादी धर्मवादी 
पूँजीवादी
 
जनता
इन सबमें डूबकर
सिर्फ गाना गाती है 
समाजवाद आ रहा है !

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