जनता

जनता !
जिसने कभी 
कोई सुख भोगा नहीं
 
नून, तेल, लकड़ी के लिये 
भागती रही, भागती रही 
खटती रही उम्र भर 
कोल्हू के बैल की तरह
 
उनके लिये
क्या आसक्ति क्या विरक्ति
क्या वानप्रस्थ
 
उनकी आँखें 
मृत्यु देवता के दर्शन तक 
रोटी में, लंगोटी में 
छप्पर में टंगी रही ।

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