राजा

जिसने ताउम्र
सिर्फ भोगा भोग 
रैयत का हरम का 
वैभव दरबार का 
सिर्फ स्वाद चखा 
तन हीरे मोतियों से ढंका 
खूब जिया जी भरकर 
महलों और रंगमहलों में
 
फिर भी उसकी भूख 
नहीं मिटती थी 
चलता था वानप्रस्थ को 
भोगने एकान्त
 
जैसे
बिल्ली. . और हज़ !

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