चांदनी
रात में सूखी नदी के किनारे
उल्लूओं
की दिल दहला देने वाली चीख
अच्छी नहीं लगती है
भूत-प्रेत के अस्तित्व में और भी
डरावनी हो जाती है
चांदनी रात भी काली बदलियों के
ओट में छिप जाती है
शमशान
घाट में नीरवता का
साम्राज्य हो जाता है
रात काली भी होती है
उजली भी होती है
पर उल्लूओं की चीख सन्नाटे को
वीभत्स
बनाती है
अब तो वे दिन भी लद गये हैं
जब उल्लू रात में चीखते थे
अब
तो दिन के उजाले में भी
हर नुक्कड़ में उल्लुओं की चीख है
दिन और रात का फर्क
क्या से क्या हो गया है
भूत प्रेत का अस्तित्व इतना हो गया है
कि अब दिन में भी
उल्लुओं की चीख सुनाई देती है
कितनी लाशें जल चुकी हैं मरघट में
सन्नाटा
और भी गहराया है
जादू
टोने के अस्तित्व से डर नहीं लगता
पर
विश्वास टूटता है तो धक्का लगता है।
पीपल
दरख्तों पर बैठे ब्रह्मराक्षस
शमशान
के बीचों-बीच
और भी भयानक लगते हैं
इन्हीं पीपल के दरख्तों के नीचे
भूतों की मीटिंग होती है
और अपने अस्तित्व को बनाये रखने हेतु
प्रपोजल रखे जाते हैं
और सर्वसम्मति से नियम बनाये जाते हैं
और
मरघट में बसे सन्नाटे का लाभ
आपस
में बराबर-बराबर बांट लेते हैं।
नियम को लागू करने के लिए
अपनी विचारधारा के प्रेतों की
एक
मंडली तैयार करते हैं
जिससे अस्तित्व भी बना रहे
और अस्मत भी बची रहे
और सन्नाटे का पूरा-पूरा लाभ
आपस
में बराबर-बराबर बांट लेते हैं।
भूत
से भूत लड़ते हैं
पर भूत नहीं खत्म होने वाले हैं
सोये हुए गहरी नींद में ही
भूत का अस्तित्व दिखाई देता है
ऐसी कुंभकर्णी नींद में पड़े हुए हैं
नगाड़े
की आवाज भी सुनाई नहीं देती
वरदान
ही गहरी नींद का है ।
इसीलिए
भूत दिखाई देते हैं
ओफ्फ कितने भयानक भूत हैं
पूरे
गले को जकड़कर बैठे हैं
आँखें उबल जाये भी तो कोई शक नहीं
उल्लुओं की चीख अब
जानी
पहचानी लगने लगी हैं।
दूर
कहीं खाई से आ रही है आवाज
जो
सन्नाटे से, प्रेतों से, उल्लुओं से
जूझती लगातार
खाई की झांई की आवाज दर्पण में चेहरा
दिखलाने की कोशिश करती लगातार
परन्तु दर्पण में चेहरा
प्रेतों का ही दिखाई देता है भाव
स्थायी
होकर बस गया है
चीत्कार
ही चीत्कार सुनाई देती है
कान के पर्दे फट न जायें
कान में ऊँगली रखे हुए हैं
चीत्कार, शमशान, पीपल और सन्नाटा
नदी के सूख गये स्रोत उल्लुओं की चीख
प्रेतों के अस्तित्व में
और भी मुखर हो रहे हैं
अंतर्यामी
होने का गौरव पा रहे हैं।
बहुआयामी हैं
चाँद, जल और चीत्कार के
अस्तित्व को नकारा जाता है
और वे बड़े ही मनोयोग से
अपना अस्तित्व प्रेतों के अस्तित्व से
उल्लुओं
की चीख, वीरान सन्नाटे से
चाँद के मुखौटा से बनाये रख रहे हैं
और मरघट के सन्नाटे का लाभ
आपस में बराबर-बराबर बांट रहे हैं।
अच्छी नहीं लगती है
भूत-प्रेत के अस्तित्व में और भी
डरावनी हो जाती है
चांदनी रात भी काली बदलियों के
ओट में छिप जाती है
साम्राज्य हो जाता है
रात काली भी होती है
उजली भी होती है
पर उल्लूओं की चीख सन्नाटे को
अब तो वे दिन भी लद गये हैं
जब उल्लू रात में चीखते थे
हर नुक्कड़ में उल्लुओं की चीख है
दिन और रात का फर्क
क्या से क्या हो गया है
भूत प्रेत का अस्तित्व इतना हो गया है
कि अब दिन में भी
उल्लुओं की चीख सुनाई देती है
कितनी लाशें जल चुकी हैं मरघट में
और भी भयानक लगते हैं
इन्हीं पीपल के दरख्तों के नीचे
भूतों की मीटिंग होती है
और अपने अस्तित्व को बनाये रखने हेतु
प्रपोजल रखे जाते हैं
और सर्वसम्मति से नियम बनाये जाते हैं
नियम को लागू करने के लिए
अपनी विचारधारा के प्रेतों की
जिससे अस्तित्व भी बना रहे
और अस्मत भी बची रहे
और सन्नाटे का पूरा-पूरा लाभ
पर भूत नहीं खत्म होने वाले हैं
सोये हुए गहरी नींद में ही
भूत का अस्तित्व दिखाई देता है
ऐसी कुंभकर्णी नींद में पड़े हुए हैं
ओफ्फ कितने भयानक भूत हैं
आँखें उबल जाये भी तो कोई शक नहीं
उल्लुओं की चीख अब
जूझती लगातार
खाई की झांई की आवाज दर्पण में चेहरा
दिखलाने की कोशिश करती लगातार
परन्तु दर्पण में चेहरा
प्रेतों का ही दिखाई देता है भाव
कान के पर्दे फट न जायें
कान में ऊँगली रखे हुए हैं
चीत्कार, शमशान, पीपल और सन्नाटा
नदी के सूख गये स्रोत उल्लुओं की चीख
प्रेतों के अस्तित्व में
और भी मुखर हो रहे हैं
बहुआयामी हैं
चाँद, जल और चीत्कार के
अस्तित्व को नकारा जाता है
और वे बड़े ही मनोयोग से
अपना अस्तित्व प्रेतों के अस्तित्व से
चाँद के मुखौटा से बनाये रख रहे हैं
और मरघट के सन्नाटे का लाभ
आपस में बराबर-बराबर बांट रहे हैं।
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सन्नाटा